आओ सनम इस पल को भी मैं प्यार का पल लिख दूँ
तुम बैठो मेरे सामने मैं तुझपे इक ग़ज़ल लिख दूँ
लगती है भीड़ दुनिया की रोज तेरे दीदार को
क्या है गलत इसमें गर तुमको ताजमहल लिख दूँ
धड़कने लगता है हर सूरत को तेरी सूरत जान के
सोच रहा हूँ मैं अपने इस दिल को पागल लिख दूँ
जबसे मिली है तू कोई और नहीं हसरत मेरी
क्यों ना अब अपनी जिंदगी को मैं मुकम्मल लिख दूँ।
तुम बैठो मेरे सामने मैं तुझपे इक ग़ज़ल लिख दूँ
लगती है भीड़ दुनिया की रोज तेरे दीदार को
क्या है गलत इसमें गर तुमको ताजमहल लिख दूँ
धड़कने लगता है हर सूरत को तेरी सूरत जान के
सोच रहा हूँ मैं अपने इस दिल को पागल लिख दूँ
जबसे मिली है तू कोई और नहीं हसरत मेरी
क्यों ना अब अपनी जिंदगी को मैं मुकम्मल लिख दूँ।
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